केतु का खगोलिय स्वरूप

15 hours ago
केतु का खगोलिय स्वरूप केतु प्रकाश पिंड न होकर छाया ग्रह है। आकाश में इसकी कोई स्थिति नहीं है। वेदों और पुराणों में इसकी स्पष्ट उपलब्धि का उल्लेख मिलता है। ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार चन्द्र-ग्रहण में भूच्छाया और सूर्य ग्रहण में चन्द्रमा को ढंकने वाले पदार्थों को राहु-केतु मानते हैं। कुछ विद्वान लोग के दक्षिण ध्रुव को केतु कहते हैं। ये दोनों ग्रह एक दूसरे 6 राशि (180 डिग्री अंश) की दूरी पर रहते हैं तथा इनकी चाल सदैव 3/10/48 रहती है और ये वक्र (उलटी) गति से ही चलते हैं। आधुनिक गणना से 6798 दिन 16 घंटे 44 मिनट और 24 सेकंड में ये ग्रह बारहों राशि और 18 मास एक राशि 240 दिन एक नक्षत्र और 60 दिन तक एक नक्षत्र-पाद पर रहते हैं। विद्वानों के अनुसार पूर्णिमा के दिन चन्द्र और राहु का अन्तर सात अंश से कम हो तो ग्रहण अवश्य होता है। दूसरे शब्दों में पृथ्वी की छाया में जब चन्द्रमा पर आजाता है तब प्रकाशहीन हो जाता है। इसी को “चन्द्र ग्रहण” कहते हैं। यदि चन्द्रमा का पूर्ण पिंड पृथ्वी की छाया में आए तब पूर्ण चन्द्र ग्रहण अधूरा पिंड छाया में आए तो खंड पृथ्वी की छाया में आए तब पूर्ण चन्द्र ग्रहण अधूरा पिंड छाया में आए तो खंड चन्द्र ग्रहण कहलाता है। जब पृथ्वी और सूर्य के बीच चन्द्रमा आ जाता है तब सूर्य का कुछ भाग नहीं दिखता है। यह “सूर्य ग्रहण” कहलाता है। सूर्य ग्रहण में सूर्य, चन्द्र तथा राहु का विचार किया जाता है। राहु दक्षिण दिशा का स्वामी है तथा अत्यन्त क्रूर माना जाता है।विष्णु पुराण के प्रथम अंश के नौवें अध्याय में प्रसंग आता है कि एक समय देवताओं और दैत्यों के बीच लम्बे समय तक युद्ध चला। भगवान विष्णु ने दोनों पक्षों से कुछ समय के लिए युद्ध रोकने को आग्रह किया ताकि समुद्र मंथन किया जा सके। जब समुद्र मंथन हुआ तब उससे कई रत्न निकले। उनमें से एक अमृत भी निकला। अमृत को प्राप्त करने के लिए रस्सी के रूप में वासुकी नागराज को लगाया गया। देवताओं ने बारी-बारी से मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाकर मंथन किया। मंथन से सर्वप्रथम हलाहल निकला। भगवान शिव ने स्वेच्छा से हलाहल को अपने कण्ठ में धारण किया। इसी के प्रभाव से उनका कण्ठ नीला हो गया। इसी कारण इन्हें नीलकण्ठ भी कहा जाता है। इसके बाद समुद्र से अनेक रत्न निकले। अन्त में अमृत को प्राप्त करने के लिए धन्वन्तरि (औषधि के जनक) प्रकट हुए। असुर अमृत के कलश को लेकर भाग गए तब भगवान विष्णु ने मोहिनी का रूप धारण किया। असुर उसकी सुन्दरता से मोहित हो गए और उसे ही अमृत बांटने का काम सौंप दिया। मोहिनी देवताओं में अमृत बांटने लगी। राहु नामक असुर ने अपनी मायावी शक्ति से देवताओं के साथ बैठकर अमृत पी लिया लेकिन इससे पहले कि वह इसे निगल पाता, सूर्य और चन्द्रमा ने इसकी पहचान कर ली। भगवान विष्णु ने उसका सिर धड़ से अलग कर दिया लेकिन राहु मुंह में अमृत होने के कारण जीवित रहा। इसलिए वह धड़-विहीन होने के बावजूद भी जीवित रहा तथा सूर्य और चन्द्रमा को क्षमा नहीं किया। इसी कारण सूर्य और चन्द्र ग्रहण लगते हैं। धड़-विहीन होने के कारण राहु अधिक समय तक सूर्य या चन्द्रमा को निगल कर नहीं रख सकता। इसलिए कुछ समय बाद वे उसके मुख से बाहर निकल आते हैं। कालान्तर में राहु का सिर-धड़ विहीन धड़ केतु के नाम से जाना जाने लगा। पुराणों शास्त्रों ने अनेक कथाओं के माध्यम से सूर्य-चन्द्र ग्रहण को समझाया। इनमें जो आकाश में गोला रहता है वही भगवान विष्णु का चक्र है क्योंकि समयकी गणना उसी से की जाती है। उस काल चक्र को भगवान ने चन्द्रमा के इशारे पर चलाया। इसका अर्थ यह है कि यह काल चक्र जिन दो बिन्दुओं पर चन्द्रमा के रास्ते से मिला वे ही राहु और केतु हैं। जब सूर्य और चन्द्रमा दोनों राहु या केतु पर हों तो सूर्य ग्रहण होता है। जब एक राहु पर और एक केतु पर हो तो चन्द्र ग्रहण होता है।ईसा की तीसरी सदी के आसपास ज्योतिष में सिद्धांत युग की शुरुआत हुई। सूर्य सिद्धांत में ग्रहण संबंधी गणना की विस्तृत विधि का उल्लेख किया गया है। इसी काल में इस बात का पता चला कि राहु और केतु चन्द्र की कक्षा के क्रमशः आरोही पात और अवरोही पात हैं, ये पृथ्वी की कक्षा के तल का प्रतिच्छेदन करते हैं। इस प्रकार राहु और केतु चन्द्र-कक्षा और क्रांतिवृत्त के दो काल्पनिक छेदन-बिन्दु मात्र रह गए।