शुक्र का खगोलीय स्वरूप
सौरमंडल में बुध के बाद दूसरा स्थान शुक्र का है। शुक्र ग्रह सूर्य से 10,80,00,000 कि.मी. की दूरी पर स्थित है और अपने परिक्रमण मार्ग पर 225 दिन में सूर्य की एक परिक्रमा पूरी करता है। इसका व्यास 12,600 कि.मी. है तथा गुरुत्व बल पृथ्वी के समान है। सूर्य तथा चन्द्रमा के बाद शुक्र ही आकाश में सबसे अधिक तेजस्वी ग्रह है। इसके सम्बन्ध में सबसे विचित्र बात यह है कि चन्द्रमा की भाँति इसके भी कलाएँ हैं, जो किसी भी दूरबीन यंत्र द्वारा सुगमता से देखी जा सकती हैं। अतः सूर्यास्त के समय पूर्व में अथवा सूर्योदय के समय पश्चिम में देखा जाता है।मध्य” तथा “प्रातः का तारा” भी कहते हैं। शुक्र ग्रह सूर्य से अधिकतम 48° दूर रहता है। उदय के 240 दिन बाद वक्री होता है। वक्री के 75 दिन बाद अस्त होता है। वक्री अवस्था में अस्त होने के 6 दिन बाद पुनः मार्गी हो जाता है। पश्चिम में 23 दिन बाद मार्गी तथा मार्गी के 240 दिन बाद पुनः पूर्व में अस्त होता है। शुक्र ग्रह सूर्यास्त के एक-दो घंटे बाद तक पश्चिम में एक-दो घंटे तक सूर्यास्त के पश्चात् दिखाई देता है। अतः सूर्य की अधिकतम 45 डिग्री दूरी पर देखा जाता है।
शुक्र को भृगु, कवि, सीत, आशु, कालज्ञ, दायक, भाग्यकारक, दैत्यगुरु आदि विभिन्न नाम दिए गए हैं।
शुक्र की गति — अपनी धुरी पर 23 घंटे 21 मिनट में पूर्ण भ्रमण करता है तथा सूर्य की परिक्रमा 224 दिन 42 घटी 2 पल में पूरी करता है। इसकी गति एक सेकंड में 22 मील है। स्थल मान से यह एक राशि पर एक मास, एक नक्षत्र पर 11 दिन रहता है।
एक वर्ष वक्री और एक वर्ष मार्गी रहता है। वक्री अवस्था में पूर्व में उदय और पश्चिम में अस्त होता है। यह मार्गी अवस्था में चर से 9 डिग्री आगे और वक्री अवस्था में 8 डिग्री आगे अस्त रहता है। इसी प्रकार मार्गी अवस्था में 250 और वक्री अवस्था में 248 दिन उदय रहता है। इस ग्रह की मार्गी अवस्था 510 दिन और वक्री अवस्था 45 दिन तक रहती है। यह सूर्य से दूसरी राशि पर वक्री, बारहवीं पर योगवाही, तीसरी और सप्तम पर समगामी रहता है। चन्द्र इसकी गति 75.42 होती है। वह परम योगवाही हो जाती है। अविचारी अवस्था में यह 10 दिन तक ही रह पाती है। वक्री होने के 7 दिन आगे या पीछे यह स्थिर भी प्रतीत होती है।
शुक्र कई बार सूर्य के कुछ समय पहले देखा जा सकता है पूर्व दिशा में दिखाई पड़ता है। इसलिए लोग इसे प्रभात या भोर का तारा भी कहते हैं। कई बार यह सूर्यास्त के समय पश्चिम दिशा में चमकता हुआ दिखाई देता है। इसलिए इसे “सायं” का तारा भी कहते हैं। किन्तु शुक्र ग्रह जब भी पूर्व दिशा में अस्त होता है तो 15 दिन बाद ही उदय हो जाता है। यह उदय के प्रायः 250 दिन बाद वक्री होता है। वक्री के 23 दिन बाद पश्चिम दिशा में अस्त हो जाता है। पश्चिम में अस्त होने के 9 दिन बाद पूर्व में पुनः उदित होता है। पुनः इसके 23 दिन बाद मार्गी तथा मार्गी के 250 दिन बाद पुनः पूर्व में अस्त हो जाता है। यह क्रम चलता ही रहता है।